विस्तृत उत्तर
पांडवों के वनवास काल के दौरान जब यह निश्चित हो गया कि कौरवों के साथ युद्ध अवश्यंभावी है, तब महर्षि वेदव्यास ने युधिष्ठिर को सलाह दी कि अर्जुन को दिव्यास्त्रों की प्राप्ति के लिए तपस्या करनी चाहिए। अर्जुन ने कठोर तपस्या आरंभ की। पहले भगवान शिव ने पाशुपतास्त्र दिया। इसके बाद अन्य लोकपाल देवता भी अर्जुन को वरदान देने के लिए प्रकट हुए। इन्हीं में दक्षिण दिशा के स्वामी यमराज भी थे। उन्होंने अर्जुन के पराक्रम और धर्मनिष्ठा से प्रसन्न होकर उन्हें अपना शक्तिशाली अस्त्र 'दण्डास्त्र' या 'यमदण्ड' प्रदान किया।
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