विस्तृत उत्तर
स्नान = अत्यंत अनुशंसित (शास्त्रीय):
शास्त्र: 'अस्नातः पूजां न कुर्यात्' — बिना स्नान पूजा न करें। स्नान = शारीरिक+मानसिक शुद्धि।
क्यों
- 1शुद्धता: शरीर शुद्ध → मन शुद्ध → पूजा शुद्ध।
- 2ऊर्जा: स्नान = पुरानी ऊर्जा धोना → नई सकारात्मक ग्रहण।
- 3सम्मान: भगवान = राजा/माता-पिता → स्वच्छ जाना = सम्मान।
व्यावहारिक
- ▸प्रातः स्नान → मंदिर = आदर्श।
- ▸स्नान संभव नहीं = हाथ-पैर-मुंह धोएं + आचमन = विकल्प।
- ▸'भक्ति भाव > स्नान' — अत्यधिक बीमार/विकलांग = मानस पूजा।
सार: स्नान करें (99% संभव)। असंभव = आचमन+शुद्धि। भाव प्रधान।





