विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में नरक में दंड देने का क्रम कर्मों की प्रकृति और यमराज के निर्णय पर आधारित है।
प्रवेश के साथ ही — यमलोक के दक्षिण द्वार से प्रवेश करते ही भयंकर अंधकार, सर्प, सिंह और राक्षस मिलते हैं। यह प्रवेश ही पहला दंड है।
क्रमबद्ध नरक — गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'सदा पापकर्मों में लगे हुए प्राणी एक नरक से दूसरे नरक को, एक दुःख के बाद दूसरे दुःख को प्राप्त होते हैं।' यह क्रम पापों की गंभीरता के अनुसार तय होता है।
पाप-विशेष का दंड — हर पाप का अपना नरक है। उसी क्रम में दंड मिलता है जिस क्रम में पाप किए गए थे — चाहे उनका प्रतिफल साथ-साथ भोगा जाए या क्रमिक।
दंड का प्राथमिकता क्रम — महापापों (ब्रह्महत्या, गोहत्या आदि) के लिए घोर नरकों में पहले भेजा जाता है। लघु पापों का दंड बाद में या अगले जन्म में मिलता है।
संजीवन का सिद्धांत — एक दंड पूरा होने पर जीव पुनः जीवित होता है और अगले दंड के लिए तैयार किया जाता है — यह क्रम निरंतर है।



