विस्तृत उत्तर
भगवद्गीता (अध्याय 17) में तीन गुणों (सत्व, रज, तम) के अनुसार श्रद्धा, तप, दान सब विभाजित हैं। मंत्र भी:
सात्विक मंत्र
- ▸उद्देश्य: ज्ञान, मोक्ष, शांति, कल्याण, भक्ति।
- ▸उदाहरण: गायत्री, महामृत्युंजय, 'ॐ नमः शिवाय', विष्णु सहस्रनाम।
- ▸प्रभाव: शांति, प्रकाश, ज्ञान, आत्मोन्नति।
- ▸विधि: शुद्ध, पवित्र, दिन में, सात्विक आहार।
राजसिक मंत्र
- ▸उद्देश्य: धन, सत्ता, यश, विजय, आकर्षण।
- ▸उदाहरण: कुछ शक्ति मंत्र, वशीकरण मंत्र (सीमित), राजसी देवता स्तुति।
- ▸प्रभाव: ऐश्वर्य, अधिकार — परंतु बंधनकारी।
तामसिक मंत्र
- ▸उद्देश्य: शत्रु नाश, मारण, उच्चाटन, भय उत्पन्न करना।
- ▸उदाहरण: अभिचार मंत्र, कुछ उग्र तांत्रिक मंत्र।
- ▸प्रभाव: विनाशकारी — दूसरे को और स्वयं को भी हानि।
- ▸अनुशंसित नहीं — कर्म बंधन।
सामान्य भक्त: सदा सात्विक मंत्र ही जपें। तामसिक मंत्र = कर्म बंधन, पाप, आत्मघाती। गीता: 'सत्त्वात् संजायते ज्ञानम्' — सत्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है।





