विस्तृत उत्तर
आग्नेयास्त्र की अग्नि को सामान्य जल या अन्य उपायों से बुझाना लगभग असंभव था। यह इसकी दिव्य प्रकृति के कारण था क्योंकि यह कोई साधारण अग्नि नहीं बल्कि अग्नि देव की दिव्य शक्ति से जागृत प्रचंड ज्वाला थी। एक बार प्रज्वलित होने पर यह तब तक शांत नहीं होती थी जब तक कि इसका लक्ष्य पूरी तरह नष्ट न हो जाए या फिर किसी अन्य शक्तिशाली दिव्यास्त्र से इसका प्रतिकार न किया जाए। यही कारण था कि इसके प्रतिकार के लिए वरुणास्त्र या पर्जन्यास्त्र जैसे दिव्य जल-अस्त्रों की ही आवश्यकता होती थी।
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