विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के सातवें अध्याय में बभ्रुवाहन कथा के प्रसंग में प्रेत-कष्टों का वर्णन भगवान विष्णु द्वारा गरुड़ को दिए ज्ञान के रूप में आता है।
इस कथा में प्रेत की स्थिति — प्रेत अंधकारमय घोर वन में भटक रहा है — गरुड़ पुराण के एक संदर्भ में उसे 'घोर वन में भटकते प्रेत' के रूप में वर्णित किया गया है। उसके पास कोई शरीर नहीं, कोई भोजन नहीं, कोई परिजन नहीं।
भूख-प्यास का कष्ट — प्रेत-योनि में जो कष्ट होते हैं वे सब इस प्रेत को भी थे — भूख-प्यास की तीव्र पीड़ा, यमदूत का भय, पापों का पश्चाताप।
अकेलापन — प्रेत परिजनों के बिना, संस्कार के बिना, निर्जन वन में अकेला था। कोई उसे सुनता नहीं, कोई देखता नहीं।
संस्कारहीनता का कष्ट — जिसका उचित संस्कार न हो, उसे कल्पान्त तक प्रेत रहना पड़ता है — यही इस प्रेत की मूल पीड़ा थी।
बभ्रुवाहन की करुणा — राजा ने इस कष्टग्रस्त प्रेत को देखा और करुणा से भर गए। उन्होंने उसके कष्टों को समझकर श्राद्ध-दान किया।
कथा का संदेश — प्रेत के ये कष्ट इसलिए बताए गए ताकि लोग जीवित रहते दान-धर्म करें और मृत्यु के बाद परिजन उचित संस्कार करें।





