विस्तृत उत्तर
हाँ। फलश्रुति (श्लोक 10) स्पष्ट रूप से यह वचन देती है:
यत्र कुत्र च यः पठेन्न हि तस्य मृत्युभयं भवेत्' — जो कोई भी, कहीं भी इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे मृत्यु का भय नहीं होता।
स्तोत्र का प्राथमिक और सबसे महत्वपूर्ण फल मृत्युभय का विनाश है। जब साधक को यह विश्वास हो जाता है कि परम शक्ति (शिव) उसकी रक्षक है, तो वह अकाल मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है। यह निर्भीकता मन के गहरे स्तर पर स्थित सभी आशंकाओं और चिंताओं का उन्मूलन है।





