विस्तृत उत्तर
माँ छिन्नमस्ता के कटे हुए धड़ से रक्त की तीन धाराएँ निकलती हैं:
— एक धारा को वे स्वयं पीती हैं।
— अन्य दो धाराएँ उनकी सहचरियों डाकिनी और वर्णिनी (जिन्हें जया और विजया भी कहा जाता है) के मुख में जाती हैं।
माँ छिन्नमस्ता विरोधाभासों की देवी हैं; वे एक साथ जीवन-दात्री (सहचरियों का पोषण) और जीवन-संहारक (आत्म-विच्छेदन) दोनों हैं।
यह साधना आत्म-बलिदान, जीवन-मृत्यु के चक्र की स्वीकृति और कुंडलिनी शक्ति के प्रचंड जागरण का प्रतीक है।
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