विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में धर्मराज द्वारा दंड देने का एक निश्चित और व्यवस्थित क्रम बताया गया है।
पहला चरण — यमलोक में पेशी। जीव यमलोक पहुँचता है, चित्रगुप्त लेखा प्रस्तुत करते हैं, जीव से पूछताछ होती है और यमराज निर्णय सुनाते हैं।
दूसरा चरण — यमलोक में प्रारंभिक दंड का दर्शन। मृत्यु के बाद पहले 24 घंटों में यमदूत जीव को यमलोक ले जाकर नरक की यातनाएँ दिखाते हैं (प्रत्यक्ष नहीं, भय दिखाने के लिए)। फिर उसे मृत्युलोक वापस भेज दिया जाता है।
तीसरा चरण — तेरहवें दिन से यात्रा और वास्तविक दंड। पिंडदान के बाद जीव की यमलोक की दीर्घ यात्रा शुरू होती है। वैतरणी, असिपत्रवन और 16 नगरों से होकर जाना होता है — यह सब दंड-प्रक्रिया का हिस्सा है।
चौथा चरण — नरक में वास्तविक दंड। यमराज के निर्णय के अनुसार जीव उचित नरक में भेजा जाता है जहाँ उसके पापकर्मों के अनुसार विशेष यातनाएँ मिलती हैं।
पाँचवाँ चरण — पाप-दंड समाप्त होने पर पुनर्जन्म। नरक की यातना पूर्ण होने पर जीव 84 लाख योनियों में से किसी में या पुनः मनुष्य योनि में जन्म लेता है।





