विस्तृत उत्तर
न्यास साधना जगत का अत्यंत महत्वपूर्ण चरण है। 'शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्' के सिद्धांत के अनुसार, न्यास साधक के भौतिक शरीर को साधना के योग्य और पवित्र मंदिर बनाता है।
न्यास दो प्रकार के होते हैं:
ऋष्यादि न्यास: स्तोत्र के ऋषि (आदि शंकराचार्य), छंद (अनुष्टुप), और देवता (अर्धनारीश्वर) का न्यास क्रमशः सिर, मुख और हृदय पर किया जाता है।
षडंग न्यास: मूल मंत्र 'नमः शिवायै च नमः शिवाय' की कल्पना करते हुए साधक हृदय, सिर, शिखा, कवच, नेत्र और अस्त्र (हाथों) पर न्यास करता है। यह न्यास साधक के शरीर में शिव और शक्ति की सुरक्षात्मक और सक्रिय ऊर्जा को स्थापित करता है।





