विस्तृत उत्तर
रावण भगवान शिव का परम भक्त था। शिव पुराण और वाल्मीकि रामायण दोनों में उसकी शिव-भक्ति का उल्लेख है।
कैलाश उठाने की कथा — एक बार रावण ने अपने बल के अहंकार में कैलाश पर्वत को ही उठाकर लंका ले जाने का निश्चय किया। उसने अपनी बीस भुजाओं से कैलाश को उठा लिया। इससे पार्वती भयभीत हुईं। तब भगवान शिव ने अपने पैर के अंगूठे से कैलाश को दबाया जिससे रावण की अंगुलियाँ कुचल गईं और वह दर्द से चिल्लाने लगा।
स्तुति रचना — रावण ने दर्द में छटपटाते हुए भी शिव की स्तुति में 'शिव तांडव स्तोत्र' की रचना की। इसे सुनकर भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने अपना पैर हटा लिया।
सिर-बलि — रावण ने एक बार नौ बार अपने सिर काटकर शिवलिंग पर अर्पित किए। दसवाँ काटने पर शिव प्रकट हुए और उसे अजेयता का वरदान और 'चंद्रहास' खड्ग दिया। उस चीत्कार (रवन) के कारण शिव ने उसे 'रावण' नाम दिया। इसीलिए वह 'दशानन' (दस सिरों वाला) कहलाया।





