विस्तृत उत्तर
रावण ने ब्रह्माजी की तपस्या करके वरदान प्राप्त किया।
चौपाई — 'गयउ निकट तप देखि बिधाता। मागहु बर प्रसन्न मैं ताता॥'
इसका अर्थ — उनका उग्र तप देखकर ब्रह्माजी उनके पास गये और बोले — हे तात! मैं प्रसन्न हूँ, वर माँगो।
रावण ने विनय करके और चरण पकड़कर कहा — 'करि बिनती पद गहि दससीसा। बोलेउ बचन सुनहु जगदीसा। हम काहू के मरहिं न मारें। बानर मनुज जाति दुइ बारें॥'
अर्थ — रावणने विनय करके और चरण पकड़कर कहा — हे जगदीश्वर! सुनिये, वानर और मनुष्य — इन दो जातियोंको छोड़कर हम और किसीके मारे न मरें (यह वर दीजिये)।
रावण ने वानर और मनुष्य को इतना तुच्छ समझा कि उनसे मृत्यु का वर नहीं माँगा — यही उसकी भूल थी जो उसके अन्त का कारण बनी।





