विस्तृत उत्तर
रावण द्वारा रचित 'शिव तांडव स्तोत्र' हिन्दू साहित्य के सर्वश्रेष्ठ स्तोत्रों में से एक माना जाता है।
रचना का प्रसंग — जब रावण ने कैलाश पर्वत उठाया और भगवान शिव ने अपने पैर के अंगूठे से उसे दबाया, तो रावण की अंगुलियाँ कुचल गईं। दर्द से छटपटाते हुए भी रावण ने उसी क्षण भगवान शिव की महिमा में एक अद्भुत स्तोत्र की रचना की।
श्लोकों की संख्या — शिव तांडव स्तोत्र में 16 श्लोक हैं। रावण ने यह संपूर्ण स्तोत्र उसी क्षण प्रचंड दर्द की अवस्था में रचा — यह उसकी अद्वितीय प्रतिभा का प्रमाण है।
स्तोत्र की विशेषता — इस स्तोत्र में भगवान शिव के तांडव नृत्य, उनके विकराल और सुंदर स्वरूप, गंगा-जटा, नागहार, डमरू-ध्वनि और उनकी सर्वव्यापी शक्ति का अत्यंत काव्यात्मक वर्णन है। यह स्तोत्र संस्कृत साहित्य में अपनी शब्द-शक्ति, लय और भक्ति-भाव के कारण अद्वितीय है।
फल — इस स्तोत्र से प्रसन्न होकर शिव ने रावण को 'चंद्रहास' खड्ग दिया और 'रावण' नाम प्रदान किया।





