विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में स्पष्ट वर्णन है कि स्वर्ग और नरक की प्राप्ति पूर्णतः व्यक्ति के जीवनकाल में किए गए कर्मों पर निर्भर करती है। जो लोग जीवन में सत्य, दान, दयालुता, भक्ति और धर्म के मार्ग पर चलते हैं, उन्हें मृत्यु के बाद स्वर्गलोक प्राप्त होता है। जो लोग झूठ, हिंसा, चोरी, व्यभिचार और अधर्म में लिप्त रहते हैं, उन्हें नरक की यातनाएँ भोगनी पड़ती हैं।
यमराज के दरबार में चित्रगुप्त द्वारा प्रत्येक जीव के कर्मों का सटीक लेखा रखा जाता है। वहाँ न कोई पक्षपात होता है, न कोई सिफारिश काम आती है — केवल कर्म ही प्रमाण होता है।
यह ध्यान रखना चाहिए कि शास्त्रों के अनुसार स्वर्ग और नरक दोनों ही अस्थायी हैं। पुण्यकर्मों का फल समाप्त होते ही स्वर्ग से वापस लौटना पड़ता है और पापकर्मों का फल समाप्त होने पर नरक से मुक्ति मिलती है। इसके बाद पुनर्जन्म होता है। केवल मोक्ष ही स्थायी और अंतिम गति है।
गरुड़ पुराण में 84 लाख और 21 घोर नरकों का वर्णन है, परंतु विद्वान मानते हैं कि ये वर्णन प्रतीकात्मक रूप से पापकर्मों के परिणामों को समझाने के लिए हैं।





