रामचरितमानस — बालकाण्डरामचरितमानस में 'राम' नाम को किन दो अक्षरों का बताया गया है?'राम' नाम दो अक्षरों — 'र' और 'म' का है। ये दो अक्षर अग्नि, सूर्य और चन्द्रमा के बीजरूप हैं तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव — तीनों का प्रतिनिधित्व करते हैं। तुलसीदासजी ने इन्हें सावन-भादों के दो महीनों की उपमा दी।#बालकाण्ड#राम नाम#दो अक्षर
रामचरितमानस — बालकाण्डखलों (दुष्टों) के स्वभाव की तुलना बालकाण्ड में किस-किस से की गई है?खलों की तुलना — (1) ओलों से (दूसरों को नष्ट कर स्वयं भी नष्ट), (2) कालनेमि-रावण-राहु से (कपटी वेषधारी), (3) जोंक से (कमल-जोंक एक जल में पर गुण भिन्न), (4) उल्लू से (प्रकाश/सत्संग से कष्ट), (5) हज़ार मुखवाले से (दोष बखानने में)।#बालकाण्ड#खल स्वभाव#उपमा
रामचरितमानस — बालकाण्डअसंतों की तुलना तुलसीदासजी ने किससे की — कौन सा प्रसिद्ध दोहा है?असंतों की तुलना ओलों से की (खेती नष्ट कर स्वयं भी गलते हैं), कालनेमि-रावण-राहु से की (वेष बनाते हैं पर कपट अन्त में खुल जाता है)। प्रसिद्ध दोहा — 'उदासीन अरि मीत हित सुनत जरहिं खल रीति' — दुष्ट किसी का भी हित सुनकर जलते हैं।#बालकाण्ड#असंत#खल स्वभाव
रामचरितमानस — बालकाण्ड'संत असंत के लक्षण' — बालकाण्ड में संत और असंत में क्या अंतर बताया गया है?संत हंस के समान गुणरूपी दूध ग्रहण करते हैं, दूसरों के दोष ढकते हैं, कपास समान निरस और उज्ज्वल हैं। असंत (खल) किसी का भी हित सुनकर जलते हैं, दूसरों के दोष हज़ार आँखों से देखते हैं। दोनों एक ही संसार में उत्पन्न होते हैं पर गुण कमल-जोंक समान भिन्न हैं।#बालकाण्ड#संत लक्षण#असंत लक्षण
रामचरितमानस — बालकाण्डतुलसीदासजी ने संतों की तुलना किस फूल से की है?संतों की तुलना अंजलि (हथेलियों) में रखे शुभ सुमन (सुन्दर फूलों) से की है। जैसे फूल दोनों हाथों को समान सुगन्ध देते हैं, वैसे ही संत सबके प्रति बिना भेदभाव के समान भाव रखते हैं।#बालकाण्ड#संत#सुमन उपमा
रामचरितमानस — बालकाण्ड'बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहिं कोइ' — संतों की क्या विशेषता बताई गई?संतों की विशेषता बताई — उनका चित्त समान है, कोई हितैषी नहीं कोई अहितैषी नहीं। जैसे हथेलियों में रखे फूल दोनों हाथों को समान सुगन्ध देते हैं, वैसे ही संत सबसे समान भाव रखते हैं।#बालकाण्ड#संत लक्षण#समदर्शी
रामचरितमानस — बालकाण्ड'बिधि हरि हर कबि कोबिद बानी। कहत साधु महिमा सकुचानी' — इसका क्या तात्पर्य है?तात्पर्य — संतों की महिमा इतनी अपार है कि ब्रह्मा, विष्णु, शिव, कवि और पण्डितों की वाणी भी उसे कहने में सकुचाती है। तुलसीदासजी ने कहा — जैसे सब्ज़ी बेचने वाला मणियों के गुण नहीं बता सकता, वैसे ही मुझसे यह महिमा कही नहीं जाती।#बालकाण्ड#संत महिमा#ब्रह्मा-विष्णु-शिव
रामचरितमानस — बालकाण्डदुष्ट व्यक्ति सत्संग पाकर कैसे सुधरता है — तुलसीदासजी ने कौन सा दृष्टान्त दिया?पारस पत्थर और लोहे का दृष्टान्त दिया — जैसे पारस के स्पर्श से लोहा सोना बन जाता है, वैसे ही सत्संग से दुष्ट भी सुधर जाता है। उल्टा नहीं होता — सज्जन कुसंगति में भी साँप की मणि समान अपने गुण रखता है।#बालकाण्ड#सत्संग#पारस
रामचरितमानस — बालकाण्ड'सठ सुधरहिं सत्संगति पाई। पारस परस कुधात सुहाई' — इसमें सत्संग की तुलना किससे की गई है?सत्संग की तुलना पारस पत्थर से की गई है। जैसे पारस के स्पर्श से लोहा सोना बन जाता है, वैसे ही दुष्ट भी सत्संगति पाकर सुधर जाते हैं। सज्जन कुसंगति में भी साँप की मणि समान अपने गुण नहीं छोड़ते।#बालकाण्ड#सत्संग#पारस
रामचरितमानस — बालकाण्डतुलसीदासजी ने सत्संग की महिमा में क्या कहा — 'बिनु सत्संग विवेक न होई' का क्या अर्थ है?अर्थ — सत्संग के बिना विवेक नहीं होता और राम की कृपा के बिना सत्संग सहज में नहीं मिलता। सत्संगति आनन्द और कल्याण की जड़ है — सत्संग की प्राप्ति ही फल है और बाकी सब साधन फूल हैं।#बालकाण्ड#सत्संग#विवेक
रामचरितमानस — बालकाण्ड'बालमीक नारद घटजोनी' — यहाँ घटजोनी कौन हैं?'घटजोनी' मुनि अगस्त्यजी हैं। उनका जन्म कलश (घड़े) से हुआ था इसलिये उन्हें 'घटजोनी' या 'कुम्भज' कहते हैं। इस चौपाई में वाल्मीकिजी, नारदजी और अगस्त्यजी तीनों का उल्लेख है।#बालकाण्ड#अगस्त्य मुनि#घटजोनी
रामचरितमानस — बालकाण्डबालकाण्ड में तुलसीदासजी ने अपने को क्या कहकर विनम्रता प्रकट की है?तुलसीदासजी ने स्वयं को 'मति अति नीच' (अत्यन्त नीची बुद्धि वाला), 'मन मति रंक' (मन-बुद्धि से कंगाल), और काव्य ज्ञान से रहित बताकर विनम्रता प्रकट की। कहा कि बुद्धि कंगाल है पर मनोरथ राजा है।#बालकाण्ड#तुलसीदास#विनम्रता
रामचरितमानस — बालकाण्ड'श्रीगुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिव्य दृष्टि हियँ होती' — इसका क्या अर्थ है?अर्थ — श्रीगुरु के चरण-नखों की ज्योति मणियों के प्रकाश समान है, जिसके स्मरण करते ही हृदय में दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो जाती है। यह प्रकाश अज्ञान रूपी अन्धकार का नाश करता है और जिसके हृदय में आ जाये उसके बड़े भाग्य हैं।#बालकाण्ड#गुरु वन्दना#चौपाई
रामचरितमानस — बालकाण्डतुलसीदासजी ने गुरु के चरणकमलों की रज को किसका सुन्दर चूर्ण कहा है?गुरु के चरणों की रज को 'अमिअ मूरिमय चूरन चारू' अर्थात् अमृत मूल (संजीवनी जड़ी) का सुन्दर चूर्ण कहा गया है, जो सम्पूर्ण भवरोगों (संसार के दुखों) के परिवार को नष्ट करने वाला है।#बालकाण्ड#गुरु वन्दना#चरण रज
रामचरितमानस — बालकाण्ड'बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि' — इसमें गुरु को क्या कहा गया है?इस दोहे में गुरु को 'कृपा सिंधु' (कृपा का समुद्र) और 'नररूप हरि' (मनुष्य रूप में साक्षात् भगवान विष्णु) कहा गया है। गुरु के वचनों को महामोह रूपी अन्धकार नष्ट करने वाली सूर्य-किरणें बताया गया।#बालकाण्ड#गुरु वन्दना#नररूप हरि
रामचरितमानस — बालकाण्डतुलसीदासजी ने गुरु की वन्दना में गुरु के चरणकमल की तुलना किससे की है?तुलसीदासजी ने गुरु के चरणकमलों की तीन उपमाएँ दीं — (1) गुरु के वचनों को महामोह-अन्धकार नष्ट करने वाली सूर्य-किरणें, (2) गुरु के चरण-रज को संजीवनी जड़ी (अमृत मूल) का सुन्दर चूर्ण, और (3) गुरु के चरण-नखों को मणियों की ज्योति।#बालकाण्ड#गुरु वन्दना#चरणकमल
रामचरितमानस — बालकाण्ड'कुंद इंदु सम देह उमा रमन करुना अयन' — इसमें किसकी स्तुति है?यह भगवान शंकरजी (शिवजी) की स्तुति है। अर्थ — जिनका कुन्द और चन्द्रमा समान गौर शरीर है, जो पार्वतीजी के प्रियतम और दीनों पर दया करने वाले हैं, वे कामदेव को भस्म करने वाले शंकरजी मुझपर कृपा करें।#बालकाण्ड#शिव स्तुति#मंगलाचरण
रामचरितमानस — बालकाण्ड'नील सरोरुह स्याम तरुन अरुन बारिज नयन' — यह किसका वर्णन है?यह भगवान विष्णु (नारायण) का वर्णन है। अर्थ — जो नील कमल समान श्यामवर्ण हैं, लाल कमल समान नेत्र हैं और सदा क्षीरसागर में शयन करते हैं, वे भगवान मेरे हृदय में निवास करें।#बालकाण्ड#भगवान विष्णु#मंगलाचरण
रामचरितमानस — बालकाण्ड'मूक होइ बाचाल पंगु चढ़इ गिरिबर गहन' — इस दोहे में किसकी कृपा का वर्णन है?यह दोहा भगवान श्रीराम की कृपा का वर्णन करता है। अर्थ है — जिनकी कृपा से गूँगा सुन्दर बोलने लगता है और लँगड़ा दुर्गम पहाड़ चढ़ जाता है, वे कलियुग के पाप जलाने वाले दयालु भगवान मुझपर दया करें।#बालकाण्ड#भगवान कृपा#मंगलाचरण
रामचरितमानस — बालकाण्ड'जो सुमिरत सिधि होइ गन नायक करिबर बदन' — यह किसकी स्तुति है?यह सोरठा श्रीगणेशजी की स्तुति है। इसमें गणेशजी को 'गन नायक' (गणों के स्वामी), 'करिबर बदन' (हाथी के मुखवाले) और 'बुद्धि रासि सुभ गुन सदन' (बुद्धि और शुभ गुणों के धाम) कहा गया है।#बालकाण्ड#गणेश वन्दना#सोरठा
रामचरितमानस — बालकाण्डरामचरितमानस के बालकाण्ड में सबसे पहले किसकी वन्दना की गई है?बालकाण्ड में संस्कृत श्लोकों में सबसे पहले शिव-पार्वती की वन्दना है। अवधी छन्दों में सबसे पहले श्रीगणेशजी की वन्दना है — 'जो सुमिरत सिधि होइ गन नायक करिबर बदन।'#बालकाण्ड#मंगलाचरण#वन्दना