विस्तृत उत्तर
बालकाण्ड में तुलसीदासजी ने संत और असंत (दुष्ट) के लक्षणों में स्पष्ट अन्तर बताया है।
संत और असंत दोनों की उत्पत्ति एक ही संसार में होती है — 'उपजहिं एक संग जग माहीं। जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं॥' अर्थ — ये दोनों संसारमें एक साथ उत्पन्न होते हैं, पर जैसे जलज (कमल) और जोंक (जोंक) के गुण अलग-अलग होते हैं, वैसे ही इनके गुण भी भिन्न-भिन्न हैं।
विधाता ने इस जड़-चेतन विश्वको गुण-दोषमय रचा है, किन्तु संतरूपी हंस दोषरूपी जलको छोड़कर गुणरूपी दूधको ही ग्रहण करते हैं — 'संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार॥'
संत दूसरों के दुख सहकर उनके दोषों को ढकते हैं, जबकि असंत दूसरों के हित सुनकर जलते हैं — 'उदासीन अरि मीत हित सुनत जरहिं खल रीति।' दुष्टों की रीति ऐसी है कि वे उदासीन, शत्रु या मित्र, किसी का भी हित सुनकर जलते हैं।
संतों का चरित्र कपास के समान शुभ है — निरस (विषयासक्ति रहित), विशद (उज्ज्वल) और गुणमय — और वे स्वयं दुख सहकर दूसरों के दोषों को ढकते हैं।

