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रामचरितमानस — बालकाण्ड⏱ 1 मिनट पठन

'बिधि हरि हर कबि कोबिद बानी। कहत साधु महिमा सकुचानी'

तात्पर्य — संतों की महिमा इतनी अपार है कि ब्रह्मा, विष्णु, शिव, कवि और पण्डितों की वाणी भी उसे कहने में सकुचाती है।

संक्षिप्त उत्तर

तात्पर्य — संतों की महिमा इतनी अपार है कि ब्रह्मा, विष्णु, शिव, कवि और पण्डितों की वाणी भी उसे कहने में सकुचाती है। तुलसीदासजी ने कहा — जैसे सब्ज़ी बेचने वाला मणियों के गुण नहीं बता सकता, वैसे ही मुझसे यह महिमा कही नहीं जाती।

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विस्तृत उत्तर

इस चौपाई का तात्पर्य है कि संतों की महिमा इतनी अपार है कि ब्रह्मा, विष्णु, शिव, कवि और पण्डितों की वाणी भी उसका वर्णन करने में सकुचाती (संकोच करती) है।

पूरी चौपाई — 'बिधि हरि हर कबि कोबिद बानी। कहत साधु महिमा सकुचानी। सो मो सन कहि जात न कैसें। साक बनिक मनि गुन गन जैसें॥'

इसका अर्थ — ब्रह्मा, विष्णु, शिव, कवि और पण्डितोंकी वाणी भी संत-महिमाका वर्णन करनेमें सकुचाती है; वह मुझसे किस प्रकार नहीं कही जाती, जैसे साग-तरकारी बेचनेवालेसे मणियोंके गुणसमूह नहीं कहे जा सकते।

तुलसीदासजी ने अपनी विनम्रता दिखाते हुए कहा कि जब ब्रह्मा-विष्णु-शिव जैसे देवता भी संतों की महिमा पूरी नहीं कह सकते, तो मैं (एक साधारण कवि) भला कैसे कह सकता हूँ — जैसे सब्ज़ी बेचने वाला रत्नों की परख नहीं बता सकता।

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

'बिधि हरि हर कबि कोबिद बानी। कहत साधु महिमा सकुचानी' — इसका क्या तात्पर्य है को संदर्भ सहित समझें

'बिधि हरि हर कबि कोबिद बानी। कहत साधु महिमा सकुचानी' — इसका क्या तात्पर्य है का सबसे सीधा सार यह है: तात्पर्य — संतों की महिमा इतनी अपार है कि ब्रह्मा, विष्णु, शिव, कवि और पण्डितों की वाणी भी उसे कहने में सकुचाती है। तुलसीदासजी ने कहा — जैसे...

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