विस्तृत उत्तर
तुलसीदासजी ने दुष्ट के सत्संग से सुधरने का दृष्टान्त पारस पत्थर और लोहे से दिया है।
चौपाई — 'सठ सुधरहिं सत्संगति पाई। पारस परस कुधात सुहाई॥'
अर्थ — दुष्ट भी सत्संगति पाकर सुधर जाते हैं, जैसे पारसके स्पर्शसे कुधातु (लोहा) सुहावना (सोना) हो जाता है।
पारस पत्थर एक पौराणिक पत्थर है जिसके स्पर्श मात्र से लोहा सोना बन जाता है। तुलसीदासजी कहते हैं कि ठीक वैसे ही संतों की संगति का प्रभाव इतना शक्तिशाली है कि बड़े-से-बड़ा दुष्ट भी उनके सम्पर्क में आकर सज्जन बन जाता है।
साथ ही तुलसीदासजी ने यह भी स्पष्ट किया कि इसका उल्टा नहीं होता — यदि सज्जन कभी कुसंगति में पड़ जाये तो वह साँप की मणि के समान अपने गुणों को नहीं छोड़ता।