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रामचरितमानस — बालकाण्ड⏱ 1 मिनट पठन

'बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहिं कोइ'

संतों की विशेषता बताई — उनका चित्त समान है, कोई हितैषी नहीं कोई अहितैषी नहीं।

संक्षिप्त उत्तर

संतों की विशेषता बताई — उनका चित्त समान है, कोई हितैषी नहीं कोई अहितैषी नहीं। जैसे हथेलियों में रखे फूल दोनों हाथों को समान सुगन्ध देते हैं, वैसे ही संत सबसे समान भाव रखते हैं।

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विस्तृत उत्तर

इस दोहे में संतों की सबसे बड़ी विशेषता बताई गई है — समदर्शिता। संत सबको समान दृष्टि से देखते हैं, उनके लिये कोई हितकारी नहीं और कोई अहितकारी नहीं।

पूरा दोहा — 'बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहिं कोइ। अंजलि गत सुभ सुमन जिमि सम सुगंध कर दोइ॥'

इसका अर्थ — मैं उन संतोंकी वन्दना करता हूँ जिनका चित्त समान है, जिनके लिये कोई हितैषी नहीं और कोई अहितैषी नहीं (अर्थात् वे सबसे समान भाव रखते हैं)। जैसे अंजलि (दोनों हथेलियों) में रखे हुए सुन्दर फूल दोनों हाथों को समान रूपसे सुगन्ध देते हैं (कोई भेदभाव नहीं करते, न दाहिने हाथ को अधिक न बायें को कम), वैसे ही संत सबके साथ समान व्यवहार करते हैं।

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

'बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहिं कोइ' — संतों की क्या विशेषता बताई गई को संदर्भ सहित समझें

'बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहिं कोइ' — संतों की क्या विशेषता बताई गई का सबसे सीधा सार यह है: संतों की विशेषता बताई — उनका चित्त समान है, कोई हितैषी नहीं कोई अहितैषी नहीं। जैसे हथेलियों में रखे फूल दोनों हाथों को समान सुगन्ध देते हैं, वैसे...

रामचरितमानस — बालकाण्ड जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है.

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रामचरितमानस — बालकाण्ड प्रश्नोत्तर
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