विस्तृत उत्तर
तर्पण के लिए दक्षिण दिशा (यम की दिशा) की ओर मुख करके कुश के आसन पर बैठें। अनामिका उंगली में कुश की अंगूठी (पवित्री) पहनें। तांबे या चाँदी के बर्तन (लोहे/स्टील का प्रयोग वर्जित है) में जल और काले तिल लें। हथेली में अंगूठे और तर्जनी के बीच के भाग ('पितृ तीर्थ') से जल को गिराते हुए "ॐ आगच्छन्तु मे पितर इमं गृह्णन्तु जलाञ्जलिम्" मंत्र का उच्चारण कर पितरों को तृप्त करें।





