विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के सातवें अध्याय में बभ्रुवाहन कथा में एक प्रेत की कथा है जिसे बभ्रुवाहन ने मुक्त किया। यह प्रेत अपने पापकर्मों और उचित संस्कार न मिलने के कारण प्रेत योनि में था।
गरुड़ पुराण में प्रेत-योनि के कारणों के संदर्भ में इस कथा का उल्लेख है। भगवान विष्णु गरुड़ को बताते हैं कि कुछ जीव — जिनका उचित अंतिम संस्कार नहीं हुआ, जिनके परिजनों ने पिंडदान-श्राद्ध नहीं किया — वे प्रेत बने रहते हैं।
इस विशेष प्रेत के विषय में — यह जीव पाप और अधूरे संस्कारों के कारण प्रेत योनि में था। उसे पिंडदान और दान की आवश्यकता थी।
गरुड़ पुराण की कथा का उद्देश्य — यह कथा यह संदेश देती है कि जब अपने परिजन श्राद्ध-पिंडदान न करें, तब भी कोई परोपकारी व्यक्ति श्राद्ध करके प्रेत को मुक्त कर सकता है। राजा बभ्रुवाहन इसी परोपकार का उदाहरण हैं।
इस कथा में प्रेत-योनि के मूल कारण — पापकर्म, मोह, अकाल मृत्यु या अधूरे संस्कार — में से किसी एक या अधिक कारण से वह जीव प्रेत था।





