विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के आठवें अध्याय में भूमिदान का अत्यंत महत्वपूर्ण वर्णन है।
महापाप-नाशक — गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'राज्य में किया हुआ अर्थात राज्यसंचालन में राजा से होने वाला महापाप न व्रतों से, न तीर्थ सेवन से और न अन्य किसी दान से नष्ट होता है, अपितु वह तो केवल भूमिदान से ही विलीन होता है।'
गोचर्म भूमिदान — गरुड़ पुराण में 'गोचर्म' (जितनी भूमि पर सौ गायें और एक बैल स्वतंत्र रूप से रह सकें) के प्रमाण में भूमि के दान को 'समस्त पापों का नाशक' कहा गया है।
ब्रह्महत्या से मुक्ति — 'जो व्यक्ति गोचर्ममात्र भूमि विधानपूर्वक सत्पात्र को देता है, वह ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त होकर पवित्र हो जाता है।'
इन्द्रलोक की प्राप्ति — 'जो व्यक्ति ब्राह्मण को धान्यपूर्ण पृथ्वी का दान करता है, वह देवताओं और असुरों से पूजित होकर इन्द्रलोक में जाता है।'
भूमिदान का प्रतीकात्मक अर्थ — भूमि सभी जीवों को आश्रय देती है। जो भूमि देता है वह मानो सभी को आश्रय देता है — इसलिए इसका फल असीम है।
गरुड़ पुराण में अष्टमहादान में भूमि का स्थान है — यह दान शाश्वत और अक्षय फल देने वाला है।


