विस्तृत उत्तर
चन्द्रशेखराष्टकम् के पहले श्लोक में त्रिपुरांतक का वर्णन है।
त्रिपुरांतक का अर्थ है तीनों पुरों (त्रिपुरासुर) का अंत करने वाले। शिव ने रत्नमय मेरु पर्वत को धनुष, वासुकी को प्रत्यंचा और विष्णु को बाण बनाकर तीनों पुरों को शीघ्र जला दिया।
चन्द्रदोष से संबंध: जीवन के 'तीन पुरों' (अहंकार, कर्म, माया) का नाश, जो मन की अस्थिरता का मूल है।





