विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण और अन्य पुराणों में चित्रगुप्त को यमराज के सहायक, न्याय के देवता और समस्त जीवों के कर्मों का लेखा रखने वाले दिव्य पुरुष के रूप में वर्णित किया गया है।
उत्पत्ति — पौराणिक कथाओं के अनुसार चित्रगुप्त ब्रह्मा जी के चित्त (मन) या शरीर से उत्पन्न हुए। इसीलिए उन्हें 'कायस्थ' कहा गया — 'काया' से उत्पन्न। एक कथा के अनुसार ब्रह्मा जी ने हजारों वर्षों तक ध्यान किया और उनके शरीर से कलम-दवात लिए एक तेजस्वी पुरुष प्रकट हुए — यही चित्रगुप्त हैं।
नाम का अर्थ — 'चित्र' अर्थात् 'दृश्य' या 'चित्त' और 'गुप्त' अर्थात् 'छिपा हुआ'। वे प्रत्येक जीव के गुप्त से गुप्त कर्म को भी देखते और लिखते हैं — इसीलिए इनका नाम 'चित्रगुप्त' है।
स्थान — चित्रगुप्त यमलोक में यमराज के सचिव, लेखाकार और सहायक के रूप में कार्य करते हैं। उनके हाथ में 'अग्रसंधानी' नामक दिव्य पंजिका होती है जिसमें सभी जीवों के कर्म लिखे हैं।
सनातन धर्म में उन्हें 'न्याय का देवता' और 'पहले लेखाकार' के रूप में पूजा जाता है।





