विस्तृत उत्तर
ग्रंथों के अनुसार दिव्यास्त्रों को प्राप्त करने के तीन मुख्य मार्ग थे। पहला था तपस्या — किसी विशेष देवता को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या करना। अर्जुन ने इसी मार्ग से भगवान शिव को प्रसन्न कर पाशुपतास्त्र प्राप्त किया था। दूसरा था गुरु-कृपा — एक योग्य गुरु से इन अस्त्रों का ज्ञान और मंत्र प्राप्त करना। यह सबसे सामान्य तरीका था। श्री राम ने महर्षि विश्वामित्र से और पांडवों ने गुरु द्रोणाचार्य से अस्त्र-विद्या सीखी थी। तीसरा था वरदान — किसी देवता द्वारा प्रसन्न होकर वरदान के रूप में अस्त्र प्रदान करना। कर्ण को इंद्र ने अपने कवच-कुंडल के बदले 'वासवी शक्ति' नामक अस्त्र वरदान में दिया था।
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