विस्तृत उत्तर
गारुड़ी विद्या गरुड़ पुराण में वर्णित वह विशेष मंत्र-विद्या है जो सर्पविष के नाश के लिए प्रयुक्त होती है। इसका नाम पक्षीराज गरुड़ से जुड़ा है जो साँपों के परम शत्रु और भगवान विष्णु के वाहन हैं।
गरुड़ पुराण के पूर्वखण्ड में 'गारूड़ी विद्या मन्त्र — पक्षिं ॐ स्वाहा' का उल्लेख मिलता है। भारतकोश के अनुसार गरुड़ पुराण में गारूड़ी विद्या मन्त्र और विष्णु पंजर स्तोत्र का वर्णन मिलता है।
गारुड़ी विद्या का सिद्धांत यह है कि गरुड़ का ध्यान, उनके नाम का मंत्रोच्चार और गरुड़-स्वरूप का आवाहन सर्पविष को नष्ट कर सकता है। पुराणों में यह वर्णन मिलता है कि गरुड़ ने अपने पराक्रम से नागों को वश में किया था। उनकी दिव्य शक्ति विष-नाशक है। इसी शक्ति का आश्रय गारुड़ी विद्या के साधक लेते हैं।
गरुड़ पुराण में आयुर्वेद और विषविज्ञान का भी वर्णन मिलता है। परंपरागत भारतीय चिकित्सा में सर्पदंश के उपचार के लिए मंत्र, ओषधि और विशेष प्रक्रियाओं का समन्वय किया जाता था। गारुड़ी विद्या इसी परम्परा का भाग है।
गरुड़ पुराण की एक उल्लेखनीय कथा में महर्षि कश्यप को गारुड़ी विद्या का ज्ञान बताया गया है। तक्षक ने उनसे कहा था कि उनके विष से आज तक कोई नहीं बचा, लेकिन कश्यप के पास मंत्र-शक्ति थी जो विष का प्रभाव दूर कर सकती थी। यह प्रसंग गारुड़ी विद्या की प्रामाणिकता को सिद्ध करता है।
दंदशूक नरक से बचाव के संदर्भ में भी गारुड़ी विद्या का महत्त्व है — जो जीव सर्पों को कष्ट देता है उसे इस नरक में सर्प-दंश भोगना पड़ता है, परंतु जो गारुड़ी विद्या और नाग-पूजन का अनुसरण करता है, वह इस पाप और नरक से सुरक्षित रहता है।





