विस्तृत उत्तर
गया को पितृ तीर्थ और मोक्ष स्थली कहा जाता है। इसके पीछे एक प्रमुख पौराणिक कथा है — गयासुर नामक असुर ने ब्रह्माजी की घोर तपस्या करके यह वरदान पाया था कि उसके दर्शन मात्र से लोग पाप मुक्त हो जाएंगे। इससे पाप करने वाले भी सहज ही स्वर्ग जाने लगे और यमराज का कार्य ठप हो गया। तब देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने गयासुर से उसका शरीर यज्ञ के लिए माँगा। गयासुर ने सहर्ष स्वीकार किया। भगवान विष्णु ने उसके शरीर पर गदा से यज्ञ किया और गयासुर को मोक्ष प्रदान किया। उन्होंने वरदान दिया कि जो भी इस स्थान पर अपने पितरों का श्राद्ध करेगा, उसके पितरों को सीधे मोक्ष की प्राप्ति होगी। माना जाता है कि आज जहाँ गया नगरी है, वहाँ गयासुर का शरीर पत्थर बनकर फैला हुआ है। इसीलिए गया के प्रत्येक शिला-खंड को पवित्र माना जाता है। गरुड़ पुराण, विष्णु पुराण और वायु पुराण में गया को पितृ तर्पण के लिए सर्वश्रेष्ठ स्थान बताया गया है। यहाँ श्रीविष्णुपद मंदिर में भगवान विष्णु के चरण-चिह्न आज भी विद्यमान हैं जिनके दर्शन से पितरों को मुक्ति मिलती है। फल्गु नदी के तट पर और अक्षयवट के पास श्राद्ध करने से 101 कुल और सात पीढ़ियों की तृप्ति होती है — ऐसी शास्त्रीय मान्यता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान राम स्वयं माता सीता और लक्ष्मण के साथ गया आए थे और यहीं राजा दशरथ का पिंड दान किया था। यही कारण है कि प्रतिवर्ष पितृ पक्ष में देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु यहाँ अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए पिंड दान, तर्पण और श्राद्ध कर्म करते हैं।





