विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण और उपनिषदों के अनुसार, जब जीवात्मा स्थूल शरीर को त्यागती है तो वह पूरी तरह से निराकार नहीं हो जाती — बल्कि वह अपने 'सूक्ष्म शरीर' को धारण कर लेती है। यह सूक्ष्म शरीर मन, बुद्धि, अहंकार और पाँच ज्ञानेन्द्रियों के सूक्ष्म तत्वों से मिलकर बना होता है।
भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जीवात्मा जब एक शरीर छोड़ती है तो मन सहित छहों इंद्रियों को समेटकर दूसरे शरीर में ले जाती है — जैसे वायु फूलों की सुगंध को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती है।
यह सूक्ष्म शरीर आत्मा के साथ यमलोक की यात्रा करता है, वहाँ कर्मों का फल भोगता है और अगले जन्म में नया स्थूल शरीर धारण करने तक इसी सूक्ष्म शरीर में रहता है। पुराणों में बताया गया है कि इसी सूक्ष्म शरीर के माध्यम से जीवात्मा को स्वर्ग या नर्क में सुख-दुःख का अनुभव होता है।
इस प्रकार मृत्यु केवल स्थूल शरीर का अंत है। जीवात्मा अपने संस्कारों, कर्मों और वासनाओं के आवरण — सूक्ष्म शरीर — को साथ लेकर आगे की यात्रा जारी रखती है, जब तक मोक्ष नहीं मिल जाता।





