विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के चतुर्थ अध्याय और बारहवें अध्याय में 'महापापी' की श्रेणी का स्पष्ट उल्लेख है।
गरुड़ पुराण के बारहवें अध्याय में सीधे कहा गया है — 'मित्रद्रोही, कृतघ्न, सुरापान करने वाला, गुरुपत्नीगामी, ब्रह्महत्यारा और स्वर्ण की चोरी करने वाला — ये महापापी कहे गये हैं।'
पंच महापाप के कर्ता — ब्रह्महत्या (ब्राह्मण की हत्या), सुरापान (मद्यपान), स्वर्णस्तेय (स्वर्ण-चोरी), गुरुपत्नी-गमन (गुरु की पत्नी से अनुचित संबंध), महापातकिसंसर्ग (महापापियों की संगति) — इन पाँच महापापों के कर्ता महापापी कहे जाते हैं।
गरुड़ पुराण के चतुर्थ अध्याय में — 'सदा पापकर्मों में लगे हुए, शुभ कर्म से विमुख प्राणी एक नरक से दूसरे नरक को, एक दुःख के बाद दूसरे दुःख को प्राप्त होते हैं।' यह महापापी की परिणति है।
व्यापक अर्थ में — जो व्यक्ति जानते-बूझते, बार-बार और निर्लज्जता से पाप करे और पश्चाताप न करे — वह भी महापापी की श्रेणी में आता है।





