विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में जल दान को सर्वोत्तम दानों में माना गया है। यममार्ग पर जाता पापी जब भूख-प्यास से व्याकुल होता है और पानी के लिए चीखता है, तब उसे जो पछतावा होता है वह सीधे उसके जीवन में किए गए कर्मों से जुड़ा होता है।
गरुड़ पुराण के तृतीय अध्याय में यमदूत पापियों को कोसते हुए कहते हैं — 'ऐ दुराचारियों! तुमने सदा सुलभ होने वाले अन्न और जल का दान क्यों नहीं दिया?' यह वचन इस बात का प्रमाण है कि जल और अन्न का दान न करना एक बड़ा पाप माना गया है।
गरुड़ पुराण में उन लोगों के पाप का विशेष उल्लेख है जो जलहीन स्थानों पर — जहाँ मनुष्य और पशु प्यास से तड़पते हैं — जल का प्रबंध करने की सामर्थ्य रखते हुए भी नहीं करते। ऐसा व्यक्ति जब यममार्ग पर खुद प्यास से तड़पता है और जल माँगता है, तब यमदूत उसे जलते हुए तेल का घूँट पिलाते हैं। वह जीव चीखता है — 'पानी पीयो और अन्न खाओ' — ऐसा कहकर दूत उसे उबलता तेल पिलाते हैं और उसकी आँतें जल जाती हैं।
इसी कारण से धर्मशास्त्र में प्याऊ लगाना, कुएँ-तालाब बनवाना, पशुओं के लिए जल-हौद बनवाना और ग्रीष्मकाल में राहगीरों को जल देना अत्यंत पुण्यकारी कार्य माना गया है। गरुड़ पुराण में उल्लेख है कि जो व्यक्ति कुएँ, तालाब, बावली और देवालय आदि को नष्ट करते हैं, वे नरक में जाते हैं — जल-स्रोतों की रक्षा करना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है।





