विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में मृत्युकाल में गाय दान को सर्वश्रेष्ठ दान माना गया है। इसके पीछे एक विशेष पारलौकिक कारण है जो इसे अन्य सभी दानों से श्रेष्ठ बनाता है।
गरुड़ पुराण के आठवें अध्याय में भगवान विष्णु गरुड़ को बताते हैं कि मृत्यु के बाद जीव को यमलोक के मार्ग में वैतरणी नदी पार करनी पड़ती है — यह नदी रक्त, मवाद, मांस और कीचड़ से भरी है तथा घड़ियाल और विषधर सर्पों से व्याप्त है। पापी जीव इस नदी में बार-बार डूबते और उभरते हैं। इस भयावह स्थिति में केवल एक वस्तु सहायक होती है — और वह है जीवनकाल में किया गया गौदान।
गरुड़ पुराण में वर्णित है कि जिस मनुष्य ने जीते-जी वैतरणी गाय का विधिपूर्वक दान किया होता है, वह गाय यमलोक के मार्ग में उस जीव के सामने प्रकट होती है। जीव उस गाय की पूँछ पकड़ लेता है और गाय उसे वैतरणी नदी से सुगमता से पार करा देती है। न डूबना, न कष्ट — बस सहज पार।
इसके अलावा, वैतरणी गाय के दान से यमदूत उस जीव को पाश में नहीं बाँधते, उसे मार्ग में कष्ट नहीं देते और उसे धर्मराज के दरबार में सम्मानपूर्वक प्रस्तुत किया जाता है।
गरुड़ पुराण में यह भी बताया गया है कि यदि कोई व्यक्ति जीते-जी गोदान नहीं कर सका, तो उसके परिजन उसके नाम से मृत्यु के बाद भी गोदान कर सकते हैं, जिसका फल उस मृतक आत्मा को प्राप्त होता है।
गोदान की विशेषता यह है कि इसमें गाय को ऐसे स्थान पर देना चाहिए जहाँ उसकी समुचित देखभाल हो — जैसे गोशाला। किसी ऐसे स्थान पर दी गई गाय जहाँ वह स्वयं कष्ट पाए, उसका फल उलटा हो सकता है।





