विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के आठवें अध्याय में भगवान विष्णु 'वैतरणी गाय' के दान का विस्तृत विवरण देते हैं। भगवान कहते हैं — 'हे खग! वैतरणी गाय का दान करने से महामार्ग में वह नदी नहीं आती, इसलिए सर्वदा पुण्यकाल में गोदान करना चाहिए।'
कृष्णा (काली) गाय को वैतरणी दान के लिए विशेष रूप से उत्तम माना गया है। यह दान विधि इस प्रकार है — एक कपिला (काली) गाय, जिसके साथ बछड़ा हो, उसे तिल से अभिमंत्रित करके किसी योग्य ब्राह्मण को दान में दिया जाता है। साथ में सोना, चाँदी और अन्य वस्तुएँ भी देने का विधान है।
गरुड़ पुराण में 'वैतरणीधेनु' नामक विशेष दान का उल्लेख है — इस विशिष्ट दान में गाय के साथ उसके सींगों को सोने से मढ़ा जाता है, खुरों को चाँदी से और पूँछ को रेशमी वस्त्र से सजाया जाता है। यह राजसी गोदान विशेष पुण्यकारी माना गया है।
जब इस प्रकार दान की गई गाय वैतरणी नदी के तट पर प्रकट होती है, तो प्रेत-नाव का चालक भी पूछता है — 'तुम्हारे पास ऐसा कौन सा पुण्य है?' उस समय दान की गई गाय साक्षी बनकर उस जीव का पक्ष लेती है और वह सम्मानपूर्वक वैतरणी पार करता है।
गरुड़ पुराण में यह भी बताया गया है कि गंगा आदि तीर्थों में, ब्राह्मण-निवासों में, ग्रहण-काल में, संक्रांति में, अमावस्या में और उत्तरायण-दक्षिणायन में गोदान करना सर्वश्रेष्ठ है।





