विस्तृत उत्तर
हिंदू शास्त्रों में पशु-पक्षियों के लिए जलहीन स्थान पर जल देने को अत्यंत पुण्यकारी कार्य माना गया है। गरुड़ पुराण सहित अनेक धर्मग्रंथों में इस दान की विशेष महत्ता बताई गई है।
सर्वप्रथम, जल-दान को 'सर्व-दान-सेष्ठम्' कहा गया है — यह सभी दानों में श्रेष्ठ है। कारण यह है कि जल जीवन का मूल है और किसी प्यासे जीव को जल देना उसे जीवन देने के समान है। विशेष रूप से ग्रीष्मकाल में जब पशु-पक्षी प्यास से व्याकुल होते हैं, उस समय उनके लिए जल का प्रबंध करना विशेष पुण्यकारी है।
गरुड़ पुराण और अन्य पुराणों के अनुसार इस पुण्य का फल इस प्रकार है — जो व्यक्ति जलहीन स्थानों पर पशु-पक्षियों के लिए जल का प्रबंध करता है, उसे यममार्ग पर जल की कमी नहीं होती, वैतरणी नदी उसके लिए सुगम हो जाती है और स्वर्गलोक में उसे सुख-सुविधाएँ मिलती हैं।
भारतकोश और पौराणिक साहित्य के अनुसार, श्राद्ध पक्ष में भी पशु-पक्षियों को जल और भोजन देने की परंपरा है जिससे पितर तृप्त होते हैं — क्योंकि हमारे पितर किसी भी योनि में हो सकते हैं।
व्यावहारिक दृष्टि से भी यह कार्य पर्यावरण और जीव-सृष्टि की रक्षा से जुड़ा है। पक्षियों के लिए छत पर जल रखना, गर्मियों में पशुओं के लिए हौद भरना — ये सरल कार्य अत्यंत महत्त्वपूर्ण पुण्य हैं।





