विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में नरक की परिभाषा और उसके स्वरूप का विस्तृत वर्णन है।
शाब्दिक अर्थ — 'नर' = मनुष्य और 'क' = गमन। जहाँ पाप करने वाले नर जाते हैं, वह 'नरक' है। यह पाप के फल भोगने का स्थान है।
गरुड़ पुराण में स्वरूप — गरुड़ पुराण के अनुसार नरक पृथ्वी के नीचे अर्थात् पाताल लोक में स्थित है। यह एक ऐसा लोक है जहाँ पापी आत्माओं को उनके कर्मों के अनुसार दंड दिया जाता है।
नरक का उद्देश्य — गरुड़ पुराण में स्पष्ट कहा गया है — 'नरक का उद्देश्य आत्मा की शुद्धि करना है। जब तक पाप का फल भुगता न जाए, तब तक आत्मा नरक में रहती है। इसके बाद उसे पुनः जन्म लेकर अच्छे कर्म करने का अवसर मिलता है।' अतः नरक सजा-स्थल नहीं, शिक्षा-स्थल है।
नरक की स्थायित्वता — नरक शाश्वत नहीं है। पाप का फल समाप्त होने पर जीव पुनः किसी योनि में जन्म लेता है।
नरक के प्रकार — 'जिस प्रकार चौरासी लाख योनियाँ हैं, उसी प्रकार चौरासी लाख नरक भी हैं।' गरुड़ पुराण में विशेष रूप से 21 से 36 प्रमुख नरकों का नाम-सहित वर्णन है।





