विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में नरक में जीव के रूप का वर्णन 'यातना-देह' के संदर्भ में किया गया है।
अंगूठे के बराबर सूक्ष्म रूप — गरुड़ पुराण में मृत्यु के समय जीव को 'अंगुष्ठमात्र प्रमाण का पुरुष' कहा गया है — अर्थात् अंगूठे के बराबर सूक्ष्म रूप में वह शरीर से निकलता है। यही सूक्ष्म जीव नरक की यात्रा करता है।
पिंडदान से निर्मित देह — नरक में जीव पिंडदान से निर्मित एक विशेष यातना-शरीर में रहता है। गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'दग्धे देहे पुनर्देहः पिण्डैरुत्पद्यते' — अर्थात् जले हुए शरीर के बाद पिंडों से नई देह उत्पन्न होती है।
वासनामय शरीर — शास्त्रीय दृष्टि से देखें तो यह वासना और कामनामय शरीर है। 'वासना और कामनामय शरीर में प्रवेश करने पर इसे प्रेतात्मा कहा गया है।'
बँधे हुए रूप में — यमदूत के पाश और जंजीरों में जकड़े हुए रूप में जीव रखा जाता है।
भोक्ता-रूप में — यह रूप केवल यातना भोगने के लिए बना है। इसमें मरने की क्षमता नहीं — यह पाप-दंड पूरा होने तक बना रहता है।





