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नरक में जीव को कितनी बार जलाया जाता है?

गरुड़ पुराण में जलाने की निश्चित संख्या नहीं, परंतु यह निरंतर प्रक्रिया है। संजीवन नरक में जलाकर पुनः जीवित करके बार-बार जलाया जाता है।

संक्षिप्त उत्तर

गरुड़ पुराण में जलाने की निश्चित संख्या नहीं, परंतु यह निरंतर प्रक्रिया है। संजीवन नरक में जलाकर पुनः जीवित करके बार-बार जलाया जाता है। 'प्रलयपर्यंत घोर नरकों में पकते रहते हैं' — यही वर्णन है।

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विस्तृत उत्तर

गरुड़ पुराण में नरक में जलाए जाने की कोई निश्चित संख्या नहीं बताई गई है — यह पापों की संख्या और गंभीरता पर निर्भर करती है। परंतु यह निरंतर और बार-बार होने वाली प्रक्रिया बताई गई है।

गरुड़ पुराण में स्पष्ट कहा गया है — 'इन सभी योनियों में घूमते हुए जब जीव मनुष्य योनि प्राप्त करते हैं।' इसका तात्पर्य है कि नरक की यातनाएँ एक नहीं बल्कि अनेक योनियों में और अनेक बार दोहराई जाती हैं।

संजीवन नरक में — जीव को जलाकर, मारकर पुनः जीवित किया जाता है और फिर जलाया जाता है। यह क्रम तब तक चलता रहता है जब तक पाप का दंड पूरा न हो।

नाभुक्तं क्षीयते कर्म' — जब तक कर्म का फल पूरी तरह भोगा न जाए, वह समाप्त नहीं होता। इसलिए जितने जीवों को जलाया था, उतनी बार जलाए जाने का दंड भोगना होगा।

गरुड़ पुराण के चतुर्थ अध्याय में कहा गया है — 'हजारों नर-नारी नारकीय यातना को भोगते हुए प्रलयपर्यंत घोर नरकों में पकते रहते हैं।' यह 'प्रलयपर्यंत' शब्द असंख्य बार की यातना का संकेत है।

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