विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में नरक में पुनर्जीवित करने की संख्या का कोई निश्चित उल्लेख नहीं है — परंतु यह प्रक्रिया पापों का दंड पूरा होने तक निरंतर चलती रहती है।
संजीवन नरक — यह नरक इसी कारण बनाया गया है। AajTak के अनुसार — 'संजीव नरक में आत्मा को मारने के बाद पुनः जीवित किया जाता है और बार-बार यातना दी जाती है।' 'संजीवन' नाम ही 'बार-बार जीवित करने' का संकेत देता है।
नाभुक्तं क्षीयते कर्म' — यह गरुड़ पुराण का मूल सिद्धांत है। जब तक पापकर्म का फल पूरी तरह भोगा न जाए, वह समाप्त नहीं होता। इसीलिए जितनी बार भोगना आवश्यक है, उतनी बार पुनर्जीवित किया जाता है।
व्यावहारिक दृष्टि — यदि एक ही जीवन में बहुत अधिक पापकर्म किए हों, तो एक बार मारने-जीवित करने की प्रक्रिया से वे सब नहीं भोगे जा सकते। इसलिए असंख्य बार पुनर्जीवित करके यातना दी जाती है।
यह तथ्य इस दार्शनिक सत्य को प्रकट करता है — कर्म अनिवार्य रूप से फलता है, मृत्यु भी उससे नहीं बचा सकती।





