विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में नरक में प्रवेश के बाद की प्रक्रिया का क्रमबद्ध वर्णन है।
प्रवेश — पापी जीव यमलोक के दक्षिण द्वार से प्रवेश करता है। यहाँ 'घोर अंधकार, सर्प, सिंह और भयंकर जीव' होते हैं। दक्षिण द्वार पर 100 वर्षों तक की यातना का उल्लेख कुछ स्रोतों में है।
नरक के यमदूतों के पास सौंपना — यमलोक के यमदूत उसे संबंधित नरक के दंडकर्मी यमदूतों को सौंप देते हैं। ये दंडकर्मी उसके पाप के अनुसार यातना प्रारंभ करते हैं।
प्रारंभिक दंड — नरक में प्रवेश के साथ ही यातना शुरू हो जाती है। पापी को उसके पापों की याद दिलाई जाती है और दंड का क्रम शुरू होता है।
निरंतर यातना — एक बार दंड पूरा होने पर अगला दंड, एक नरक से दूसरे नरक। गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'हजारों नर-नारी नारकीय यातना को भोगते हुए प्रलयपर्यंत घोर नरकों में पकते रहते हैं।'
अंत में मुक्ति — 'उस पाप का अक्षय फल भोगकर पुनः वहीं पैदा होते हैं और यम की आज्ञा से पृथ्वी पर आकर स्थावर आदि योनियों को प्राप्त करते हैं।' — यही नरक-प्रवास का अंतिम परिणाम है।





