विस्तृत उत्तर
श्री विद्या साधना में दोनों ही मार्ग पाए जाते हैं:
दक्षिणाचार (समयाचार):
— अधिक सात्विक और वैदिक अनुष्ठानों के अनुरूप।
— आंतरिक पूजा और ध्यान पर अधिक बल दिया जाता है।
वामाचार (कौलाचार):
— पंचमकार का शाब्दिक या प्रतीकात्मक प्रयोग हो सकता है।
— अधिक गूढ़ माना जाता है।
अधिकांश श्री विद्या ग्रंथ दक्षिणाचार पर केंद्रित हैं, लेकिन कुछ तांत्रिक परंपराओं में कौलाचार को भी सर्वोच्च स्थान दिया गया है। यह साधक की पात्रता और गुरु के निर्देश पर निर्भर करता है।
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