विस्तृत उत्तर
भागवत पुराण (11वां स्कंध) में दत्तात्रेय ने राजा यदु को बताया कि उन्होंने प्रकृति और प्राणियों से 24 गुरु बनाए। यह शिक्षा अद्भुत है।
पृथ्वी से धैर्य और क्षमा सीखी। वायु से निर्लिप्तता — हवा सब जगह जाती है पर कहीं अटकती नहीं। आकाश से विशालता — आत्मा आकाश जैसी असीम। जल से निर्मलता और शीतलता। अग्नि से तेज और शुद्धता। चंद्रमा से यह कि आत्मा अविनाशी है जैसे चंद्रमा के कला बदलने पर भी चंद्रमा वही रहता। सूर्य से दान — सूर्य सबको प्रकाश देता, भेद नहीं करता।
मधुमक्खी से संग्रह का दोष सीखा। हाथी से काम वासना का खतरा। हिरण से संगीत मोह। मकड़ी से यह कि अपनी रचना में स्वयं फंस जाना। पतंगे से आकर्षण में जलना। इसी प्रकार कुल 24 गुरु।
शिक्षा — ज्ञानी वही जो हर जगह से सीखे। गुरु केवल मनुष्य नहीं — प्रकृति सबसे बड़ा गुरु।





