विस्तृत उत्तर
प्राचीन काल में अस्त्र विद्या की शिक्षा कुछ विशेष गुरुओं से ही मिलती थी — यह सर्वसाधारण के लिए नहीं थी।
परशुराम — सबसे महान अस्त्र-शिक्षक माने जाते थे। उन्होंने भीष्म, द्रोणाचार्य और कर्ण को अस्त्र-विद्या दी। वे केवल ब्राह्मणों को सर्वोच्च अस्त्र-विद्या देते थे। परशुराम आज भी जीवित माने जाते हैं और भविष्य में कल्कि को शिक्षा देंगे।
द्रोणाचार्य — परशुराम के शिष्य। उन्होंने पांडव और कौरव दोनों को धनुर्वेद का ज्ञान दिया। अर्जुन उनके सर्वश्रेष्ठ शिष्य थे जिन्हें ब्रह्मास्त्र सहित सभी उच्चतम अस्त्र दिए।
देवगुरु शुक्राचार्य और बृहस्पति — दैत्य और देव दोनों पक्षों के अस्त्र-ज्ञान के स्रोत थे।
स्वयं देवताओं से — अर्जुन ने शिव से पाशुपतास्त्र, इंद्र से वज्रास्त्र, यम-वरुण-कुबेर से उनके अस्त्र सीखे। यह मार्ग दुर्लभ था।
पात्रता — अस्त्र विद्या के लिए गुरु योग्यता देखते थे। शारीरिक बल नहीं, मन और आत्मा की शक्ति आवश्यक थी। गुरु-श्रद्धा, आचरण-शुद्धि और धर्म-पालन अनिवार्य था।





