विस्तृत उत्तर
पौराणिक काल में दिव्यास्त्र कोई साधारण हथियार नहीं थे जिन्हें कोई भी उठाकर चला सके। इन्हें प्राप्त करने के लिए असाधारण योग्यता, कठोर अनुशासन और आध्यात्मिक शक्ति की आवश्यकता होती थी। दिव्यास्त्र प्राप्त करने के दो मुख्य मार्ग थे। पहला और सबसे प्रमुख मार्ग था कठोर तपस्या द्वारा देवताओं को प्रसन्न करना। जैसे अर्जुन ने भगवान शिव की घोर तपस्या करके उनसे पाशुपतास्त्र प्राप्त किया था, उसी प्रकार नागास्त्र जैसे अस्त्र भी देवताओं के वरदान से ही मिलते थे। दूसरा मार्ग था गुरु-शिष्य परंपरा, जिसमें योग्य गुरु अपने सबसे काबिल शिष्यों को इन अस्त्रों का ज्ञान और मंत्र प्रदान करते थे, जैसे गुरु परशुराम ने कर्ण को भार्गवास्त्र का ज्ञान दिया था।
आगे क्या पढ़ें
प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी पंचांग लिंक





