विस्तृत उत्तर
पुराणों और महाकाव्यों में दिव्यास्त्र प्राप्ति के मुख्यतः तीन मार्ग बताए गए हैं।
पहला मार्ग — देव-तपस्या: योद्धा किसी विशेष देवता की घोर तपस्या करता था। व्रत, उपवास, ध्यान, इंद्रियसंयम और मन की शुद्धि आवश्यक थी। देव प्रसन्न होकर स्वयं प्रकट होते और वरदान स्वरूप अस्त्र देते थे। अर्जुन ने हिमालय में तपस्या करके किरात वेशधारी शिव से पाशुपतास्त्र प्राप्त किया। यम, वरुण, कुबेर और इंद्र से भी अस्त्र प्राप्त किए।
दूसरा मार्ग — गुरु शिक्षा: किसी महान सिद्ध गुरु से विधिपूर्वक शिक्षा ग्रहण करना। परशुराम ने भीष्म, द्रोण, कर्ण को अस्त्र-विद्या दी। द्रोण ने पांडव-कौरवों को दी। यह मार्ग अधिक सुलभ था किंतु गुरु-शिष्य की पात्रता देखते थे।
तीसरा मार्ग — युद्ध में वरदान: कभी-कभी युद्ध में पराक्रम देखकर देव स्वयं अस्त्र प्रदान करते थे।
शर्त — दिव्यास्त्र सभी को नहीं मिलते थे। योद्धा में योग्यता, पात्रता, पवित्रता और एकाग्रचित्तता आवश्यक थी। बिना इन गुणों के अस्त्र न मिलता था, और यदि मिल भी जाए तो वह विधिवत काम नहीं करता था।





