विस्तृत उत्तर
दिव्यास्त्रों की प्राप्ति कोई साधारण घटना नहीं थी। पर्जन्यास्त्र, पर्जन्य देव की असीम कृपा या किसी विशिष्ट गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से ही सिद्ध किया जा सकता था। इसके लिए साधक को या तो संबंधित अधिपति देवता को प्रसन्न करने के लिए वर्षों कठोर तपस्या करनी पड़ती थी, या फिर किसी सिद्ध गुरु की कृपा और उनकी गहन शिक्षा से यह दुर्लभ ज्ञान प्राप्त होता था। यह जटिल और श्रमसाध्य प्राप्ति प्रक्रिया अस्त्र की दिव्यता और महत्व को और भी बढ़ा देती है। ऐसे अस्त्र केवल उन्हीं योद्धाओं को सौंपे जाते थे जो नैतिक रूप से दृढ़ हों और उनके प्रयोग की गहन जिम्मेदारी को समझने में सक्षम हों।
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