विस्तृत उत्तर
साधक के अपने प्रयास उसे एक सीमा तक ही ले जा सकते हैं, परंतु मोक्ष केवल गुरु-कृपा से ही संभव है।
यह कृपा 'शक्तिपात' के रूप में शिष्य में संचारित होती है, जो उसकी सोई हुई कुंडलिनी को जाग्रत करती है और साधना के विघ्नों से उसकी रक्षा करती है।





