विस्तृत उत्तर
शक्तिपात का रहस्य दीक्षा के मर्म को उजागर करता है। एक सिद्ध गुरु वर्षों की साधना से अपने मंत्र को चैतन्य कर लेते हैं; उनका संपूर्ण अस्तित्व ही मंत्रमय हो जाता है।
दीक्षा के क्षण में, गुरु अपनी इसी सिद्ध आध्यात्मिक ऊर्जा को शिष्य के भीतर संचारित करते हैं, जिससे शिष्य की सुषुप्त कुंडलिनी शक्ति जाग्रत होने की प्रक्रिया आरंभ होती है।
यह शक्तिपात गुरु अपनी इच्छा से स्पर्श द्वारा (स्पर्श दीक्षा), दृष्टि मात्र से (दृष्टि दीक्षा), शब्द या मंत्र के माध्यम से (मंत्र दीक्षा) अथवा केवल अपने संकल्प से (संकल्प दीक्षा) भी कर सकते हैं।





