विस्तृत उत्तर
दिव्यास्त्रों का ज्ञान अत्यंत गुप्त और पवित्र माना जाता था। यह ज्ञान गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से एक योग्य शिष्य को ही दिया जाता था, वह भी उसके चरित्र और संयम की कठोर परीक्षा लेने के बाद। किसी अस्त्र को प्राप्त करने का सर्वोच्च मार्ग था उसे सीधे उसके अधिष्ठाता देवता से तपस्या या धर्म के कार्यों के पुरस्कार के रूप में प्राप्त करना। इंद्रास्त्र के प्रमुख योद्धाओं ने इसे अलग-अलग तरीकों से प्राप्त किया और इसे प्राप्त करने का तरीका उनके चरित्र को भी दर्शाता है।
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