विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में गौ-रक्षा और ब्राह्मण-सेवा को गृहस्थ के सर्वोच्च कर्तव्यों में गिना गया है। जो व्यक्ति इन कर्तव्यों की उपेक्षा करता है, उसे यमलोक में और फिर अगले जन्म में इसका घोर पछतावा होता है।
गरुड़ पुराण के द्वितीय अध्याय में जब पापी जीव यमलोक के मार्ग में है और यमदूत उसे पीटते हैं, तब वे कहते हैं — 'तुमने दान नहीं दिया, अग्नि में हवन नहीं किया, तीर्थों में नहीं गए, देवताओं की पूजा नहीं की। गृहस्थ होते हुए भी तुमने धर्म का पालन नहीं किया।' इन वचनों में गाय और ब्राह्मण के प्रति दायित्व की बड़ी चिंता है।
गरुड़ पुराण के पाँचवें अध्याय में कहा गया है कि जो व्यक्ति ब्राह्मण को भूमि देकर पुनः छीन लेता है, वह साठ हजार वर्षों तक कीड़े की योनि में रहता है। जो ब्राह्मण का अतिक्रमण करता है, वह जन्मान्ध और दरिद्र होता है — वह कभी दाता नहीं बन सकता, सदा याचक ही रहता है।
गाय की उपेक्षा के लिए भी यमलोक में भयानक परिणाम हैं। गोघाती की तो वैतरणी और महावीचि नरक में यातना होती ही है, लेकिन जो केवल उपेक्षा करता है — जिसके पास सामर्थ्य होते हुए भी गाय की रक्षा नहीं करता — वह भी पछतावे की ज्वाला में जलता है।
यमलोक के मार्ग में पापी यह सोचता है — 'अरे, जो मानव जन्म मुझे कठिन तप के बाद मिला था, उसमें मैंने धर्म नहीं किया, दान नहीं दिया, गायों की सेवा नहीं की, ब्राह्मणों का सत्कार नहीं किया — यह मैंने क्या किया!' यह पछतावा उसे अनंत काल तक जलाता है, क्योंकि अब सुधार का अवसर नहीं रहता।





