विस्तृत उत्तर
आहुति देते समय हाथों की स्थिति (मुद्रा) का भी यज्ञ के फल पर गहरा प्रभाव पड़ता है। शास्त्रों में विभिन्न कर्मों के लिए विभिन्न मुद्राओं का विधान है:
मृगी मुद्रा: अंगूठा, मध्यमा (बीच की उंगली) और अनामिका (तीसरी उंगली) की सहायता से आहुति देना। इसे शांतिकर्मों और सामान्य देव-यज्ञों के लिए सर्वाधिक शुभ एवं उपयुक्त माना गया है।
हंसी मुद्रा: सबसे छोटी उंगली (कनिष्ठा) को छोड़कर शेष तीन उंगलियों और अंगूठे का प्रयोग करना। यह मुद्रा पौष्टिक कर्मों (समृद्धि एवं स्वास्थ्य वर्धन) के लिए उपयोगी है।
सूकरी मुद्रा: इसका प्रयोग मुख्य रूप से अभिचार कर्मों या विशिष्ट तांत्रिक प्रयोगों में किया जाता है, जो सामान्य देव-यज्ञ में वर्जित है।

