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नरक में जीव को बार-बार कष्ट क्यों मिलता है?

गरुड़ पुराण में नरक में जीव को बार-बार कष्ट मिलने का कारण कर्म-न्याय के सिद्धांत में निहित है।

संक्षिप्त उत्तर

नरक में बार-बार कष्ट इसलिए मिलता है क्योंकि जीवन के हर पाप का अलग दंड है, संजीवन नरक में मारकर पुनः जीवित किया जाता है, यातना-देह पुनः बन जाती है और 'बिना भोगे कर्म समाप्त नहीं होता।'

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विस्तृत उत्तर

गरुड़ पुराण में नरक में जीव को बार-बार कष्ट मिलने का कारण कर्म-न्याय के सिद्धांत में निहित है।

पहला कारण — पाप की बार-बार की पुनरावृत्ति। जिसने जीवन में एक पाप बार-बार किया, उसे नरक में भी वह दंड बार-बार भोगना पड़ता है। एक बार की पिटाई से हजारों बार के पाप का दंड पूरा नहीं होता।

दूसरा कारण — संजीवन नरक का सिद्धांत। संजीवन नरक में जीव को मारने के बाद पुनः जीवित किया जाता है और फिर यातना दी जाती है। यह चक्र तब तक चलता रहता है जब तक पापों का दंड पूरा न हो।

तीसरा कारण — नरक की यातना-देह की विशेषता। यह देह नष्ट होकर पुनः बन जाती है। इसे मृत्यु नहीं आती। इसलिए यातना निरंतर जारी रहती है।

चौथा कारण — 'नाभुक्तं क्षीयते कर्म' — जब तक कर्म का फल पूरी तरह भोगा न जाए, वह समाप्त नहीं होता। इसलिए जब तक पापों का पूरा हिसाब न चुके, बार-बार कष्ट मिलता रहता है।

यह वर्णन जीवन में पाप न करने की सबसे बड़ी प्रेरणा है।

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